प्राक्कथन:-

आदि काल से ही मानव मस्तिष्क ज्ञानार्जन हेतु माँ सरस्वती की अर्चना करता रहा है | जिसके परिणाम स्वरूप ऋषिकुल एवं वेदाश्रमो की स्थापनाएँ की गई | जैसा कि गीता में भगवान श्रीकृष्ण जी के द्वारा कहा गया है कि -
 
नहीं ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह बिहते |
 
आस्ष्कि मन स्वीकार करता है कि ईश्वरीय कार्य के सम्पादन के लिए असामान्य आत्माएँ आती है और युग के पटल पर स्वयं को रेखाकिंत कर चली जाती है | किशोरावस्था में वे भारतीय वायु सेना में सम्मिलित हुए| कालान्तर से सरस्वती के इस वरद पुत्र को मात्र अध्यापन से संतोष प्राप्त नहीं हुआ |
 
परिवर्तिनि खलु संसारे मृतः को बा न जयते |
सा जातो एन जातें जाति वंशः समृन्नतिम् ||
 
आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि यह महाविद्यालय सामाजिक उत्थान में उत्तरोतर विकास करता रहेगा |